60 के दशक में भारत ने घरेलू जमीन के साथ साथ विदेशों में भी बेहतर खेल दिखाना शुरू किया था। इस दौर में ई प्रसन्ना, मंसूर अली खां पटौदी, दिलीप सरदेसाई, हनुमंत सिंह और चंदू बोर्डे जैसे खिलाड़ियों ने बेहतरीन प्रदर्शन कर सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था।
70 के दशक में भारतीय क्रिकेट टीम में स्पिनरों का बोलबाला रहा। बिशन सिंह बेदी, ईरापली प्रसन्ना, वेंकटराघवन और चंद्रशेखर जैसे फिरकी के जादूगरों ने विपक्षी खिलाड़ियों पर दबदबा बनाए रखा। इसी दौर में भारत के दो सबसे महान बल्लेबाज सुनील गावस्कर और गुंडप्पा विश्वनाथ ने विश्व क्रिकेट में अपनी बल्लेबाजी से लोहा मनवाया।
80 का दशक भारतीय क्रिकेट के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। 1983 में भारत ने दुनिया की सबसे खतरनाक टीमों में शुमार वेस्टइंडीज को हराते हु देश में क्रिकेट की लोकप्रियता को बेतहाशा बल मिला था। इस दौर में भारत ने दुनिया को मोहम्मद अजहरूद्दीन, दिलीप वेंगसरकर जैसे बल्लेबाज और रवि शास्त्री जैसे ऑलराउंडर दिए।
इसी दशक में भारत के महान बल्लेबाज सुनील गावस्कर ने 34 शतक बनाए जो विश्व क्रिकेट में रिकॉर्ड था। कपिल देव ने भी इस दौर में टेस्ट क्रिकेट में न्यूजीलैंड के रिचर्ड हैडली के रिकॉर्ड को तोड़ते हुए 434 विकेट लिए थे। इससे पहले ये रिकॉर्ड रखने वाले हैडली ने अपने जीवन में 431 टेस्ट विकेट लिए थे।
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